राज्यपाल बनाम राज्य विधानसभा
Page 4: सुप्रीम कोर्ट के निर्णय, दुरुपयोग और संवैधानिक सीमाएँ
UPSC GS-II • Indian Polity • Constitutional Governance
🔹 1. राज्यपाल की भूमिका पर न्यायिक समीक्षा
संविधान के अनुसार राज्यपाल का पद न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) से पूर्णतः मुक्त नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि राज्यपाल की शक्ति का प्रयोग संवैधानिक मर्यादाओं के भीतर होना चाहिए।
🔹 2. महत्वपूर्ण सुप्रीम कोर्ट के निर्णय
- S.R. Bommai बनाम भारत संघ (1994) – राष्ट्रपति शासन और राज्यपाल की रिपोर्ट न्यायिक समीक्षा के अधीन है।
- Nabam Rebia बनाम अरुणाचल प्रदेश (2016) – राज्यपाल विधानसभा सत्र बुलाने में स्वेच्छाचारी नहीं हो सकता।
- Shivraj Singh Chouhan Case (2020) – फ्लोर टेस्ट का आदेश संविधान सम्मत परिस्थितियों में ही।
- Punjab Speaker Case (2023) – संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्ति अनिश्चितकाल तक निर्णय टाल नहीं सकते।
🔹 3. दुरुपयोग के प्रमुख क्षेत्र
- विधानसभा सत्र बुलाने में देरी
- विधेयकों को लंबे समय तक रोके रखना
- सरकार गठन में पक्षपात
- राष्ट्रपति शासन की सिफारिश
🔹 4. संविधान क्या कहता है?
- अनुच्छेद 163 – मुख्यमंत्री की सलाह बाध्यकारी
- अनुच्छेद 174 – सत्र बुलाने की शक्ति
- अनुच्छेद 200 – विधेयकों पर निर्णय
- अनुच्छेद 356 – असाधारण परिस्थिति में ही प्रयोग
🔹 5. संघीय ढाँचे पर प्रभाव
बार-बार हस्तक्षेप से संघवाद की भावना कमजोर होती है। राज्यों की स्वायत्तता प्रभावित होती है और केंद्र–राज्य संबंधों में तनाव बढ़ता है।
उत्तर में केस लॉ + अनुच्छेद + संघवाद को जोड़कर लिखें। आलोचना के साथ न्यायिक संतुलन दिखाएँ।
➡️ अगला पेज: Page 5 – सुधार, सुझाव और Way Forward
© Shaktimatha Learning | Governor vs Assembly Series (Hindi)
No comments:
Post a Comment