स्पीकर बनाम दलबदल विरोधी कानून
Page 2: स्पीकर की शक्तियाँ, विवेकाधिकार और न्यायिक दिशा-निर्देश
UPSC GS-II • Constitutional Bodies • Governance
🔹 1. स्पीकर की संवैधानिक शक्तियाँ
दलबदल विरोधी कानून के अंतर्गत स्पीकर/अध्यक्ष को यह अधिकार प्राप्त है कि वह यह तय करे कि कोई विधायक दलबदल का दोषी है या नहीं। यह शक्ति 10वीं अनुसूची से प्राप्त होती है।
- दलबदल याचिका पर निर्णय
- सदस्य की अयोग्यता घोषित करना
- विधानसभा की सदस्यता समाप्त करना
🔹 2. विवेकाधिकार (Discretionary Power)
संविधान ने स्पीकर को न्यायिक समान (quasi-judicial) भूमिका दी है। लेकिन समस्या तब उत्पन्न होती है जब यह विवेक राजनीतिक पक्षपात से प्रभावित होता है।
- निर्णय में अत्यधिक देरी
- सरकार बचाने या गिराने में भूमिका
- सत्तारूढ़ दल के पक्ष में झुकाव
🔹 3. Kihoto Hollohan बनाम Zachillhu (1992)
इस ऐतिहासिक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने दलबदल विरोधी कानून की वैधता को स्वीकार किया, लेकिन साथ ही यह भी कहा कि:
- स्पीकर का निर्णय न्यायिक समीक्षा के अधीन होगा
- स्पीकर संविधान से ऊपर नहीं है
- निष्पक्षता आवश्यक है
🔹 4. हालिया सुप्रीम कोर्ट दिशा-निर्देश
हाल के मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि:
- दलबदल मामलों का निर्णय समय-सीमा में होना चाहिए
- जानबूझकर देरी संवैधानिक उल्लंघन है
- स्पीकर का पद तटस्थ रहना चाहिए
“Speaker is expected to act as a neutral constitutional authority, not as a party functionary.”
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© Shaktimatha Learning | Speaker vs Anti-Defection Series (Hindi)
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